दहेज़ प्रथा (Dahej Pratha Kavita in Hindi)
(औरत का सामाजिक व्यापार)
काली घटायें कुछ इस कदर छाई,
रूपये पैसों के मोल गूंजी शहनाई|
व्यापारी ने मनचाही बोली लगाई,
देनदार ने ख़ुशी से गर्दन झुकाई|
मोलभाव था यह किसी के सपनों का,
दांव खेला जा रहा था उसके जीवन का|
अरमानो का हुआ कुछ ऐसा व्यापार,
वस्तु का कोई नहीं था उसमे विचार|
जब ऐसा ही देना था जीवन संसार,
तो सही ही है कन्या भ्रूणहत्या का विचार |
No comments:
Post a Comment